सजीव सारथी


जन्म हुआ २४ फरवरी १९७४ को दक्षिण भारत के एक छोटे से गाँव में। चार साल के थे जब दिल्ली आये, तब से यहीं हैं। बचपन से ही साहित्य , संगीत और सिनेमा , इनके जीवन के अधार रहे, वाणिज्य में सनातन किया ताकि कोई अच्छी नौकरी मिले वो मिली भी, पर मन हमेशा रचनात्मक कार्य-कलापों में ही लगा। स्कूल से ही सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी शुरू हो चुकी थी, जो कॉलेज़ में पहुँच कर अपने चरम पर पहुँची।

मूलतः एक गीतकार हैं ,जो कविताओं में अपने आपको तलाश करते हैं, कहानी-पटकथा-संवाद भी लिख लेते हैं, कुल सात लघु फ़िल्में और ३ फुल लेंथ फिल्मे लिख चुके हैं, जिनमें से मात्र दो लघु फिल्मों को ही बन कर प्रसारित होने का सौभाग्य मिल पाया है, एक संगीत समुदाय के सदस्य हैं, दो धारावाहिकों के लिए शीर्षक गीत लिखने के साथ साथ बतौर सह निर्देशक भी काम कर चुके हैं ..... और कोशिशें जारी है।

गीतकार कवियों को अधिक पढ़ते हैं , इसलिये जाहिर है कि गुलज़ार साब , जावेद अख़्तर, निदा फ़ाज़ली, नीरज, इंदीवर, मजरूह, रविंद्र जैन सभी धड़कनें हैं इनकी, यूँ तो थोड़ा-थोड़ा निराला, नागार्जुन, बशीर बद्र , मीर, ग़ालिब सभी को पढ़ा है। शैलेंद्र इनके अतिप्रिय हैं जिनकी इन दो पक्तियों में इनके अनुसार इनके जीवन का सार है-

" आबाद नहीं बरबाद सही, गाता हूँ ख़ुशी के गीत मगर,
जख्मों से भरा सीना है मेरा , हँसती है मगर ये मस्त नज़र "

संपर्क-
७७७, सेक्टर ६
आर के पुरम, नई दिल्ली-११००२२

आवाज़-मंच के सम्पादक
हिन्द-युग्म-कवितायें पर इनका वार- शुक्रवार